केसर सिंह / स्वदेशी हेल्थ रिसर्च इंस्टीट्यूट
इन्फ्लेमेटरी बॉवल डिजीज (Inflammatory Bowel Disease; IBD) जठरांत्र मार्ग (Gastrointestinal Tract) की पुरानी एवं सूजनकारी (Chronic Inflammatory) बीमारियों का एक समूह है, जो मुख्य रूप से छोटी आंत (Small Intestine) और बड़ी आंत (Colon) को प्रभावित करता है। इसके दो प्रमुख प्रकार हैं—क्रोहन रोग (Crohn’s Disease) और अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative Colitis)। इन रोगों में प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) असामान्य रूप से सक्रिय होकर आंतों के ऊतकों पर ही हमला करने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप लगातार सूजन, अल्सर, रक्तस्राव तथा संरचनात्मक क्षति हो सकती है। यदि समय पर उपचार न मिले तो आंत में छेद (Perforation), फिस्टुला (Fistula), आंत्र अवरोध (Bowel Obstruction) और सर्जरी जैसी गंभीर स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। आधुनिक चिकित्सा में सूजनरोधी दवाएँ, इम्यूनोसप्रेसेंट्स तथा बायोलॉजिक थेरेपी प्रभावी उपचार विकल्प हैं, जबकि इंटीग्रिन इन्हिबिटर्स (Integrin Inhibitors) और अन्य लक्षित उपचार भविष्य की आशाजनक चिकित्सा के रूप में उभर रहे हैं।
परिचय
पेट दर्द, बार-बार दस्त लगना, मल में रक्त आना, अत्यधिक थकान और बिना कारण वजन घटना जैसे लक्षण अक्सर सामान्य पाचन समस्याओं के रूप में नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। किंतु कई बार ये लक्षण एक गंभीर सूजनकारी आंत्र रोग अर्थात् इन्फ्लेमेटरी बॉवल डिजीज (IBD) के संकेत हो सकते हैं।
IBD कोई एक बीमारी नहीं है, बल्कि रोगों का एक समूह है, जिसमें मुख्यतः दो अवस्थाएँ शामिल होती हैं—
- क्रोहन रोग (Crohn’s Disease)
- अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative Colitis)
दोनों रोग दीर्घकालिक (Chronic) होते हैं तथा इनमें समय-समय पर रोग भड़कने (Flare-ups) और शांत होने (Remission) के चक्र चलते रहते हैं। आधुनिक चिकित्सा प्रबंधन के बावजूद यह रोग विश्वभर में लाखों लोगों की जीवन गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है।
IBD और IBS में अंतर
अक्सर लोग IBD और IBS (Irritable Bowel Syndrome) को एक ही बीमारी समझ लेते हैं, जबकि दोनों पूरी तरह अलग स्थितियाँ हैं।
| विशेषता | IBD | IBS |
|---|---|---|
| सूजन (Inflammation) | उपस्थित | अनुपस्थित |
| ऊतक क्षति | होती है | नहीं होती |
| रक्तस्राव | संभव | सामान्यतः नहीं |
| कोलोनोस्कोपी में परिवर्तन | स्पष्ट दिखाई देते हैं | सामान्य हो सकती है |
| कैंसर का जोखिम | बढ़ सकता है | नहीं बढ़ता |
इसी प्रकार सीलिएक रोग (Celiac Disease) भी IBD से अलग है, क्योंकि उसमें ग्लूटेन के प्रति असामान्य प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया होती है।
IBD क्यों होता है?
IBD का सटीक कारण अभी तक पूर्ण रूप से ज्ञात नहीं है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह कई कारकों के संयुक्त प्रभाव से विकसित होता है।
1. आनुवंशिक प्रवृत्ति (Genetic Predisposition)
अनुसंधानों से पता चला है कि IBD से जुड़े 200 से अधिक आनुवंशिक परिवर्तन (Genetic Variants) पहचाने जा चुके हैं। जिन परिवारों में पहले से यह रोग मौजूद है, उनमें जोखिम अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है।
हालाँकि केवल जीन होना पर्याप्त नहीं है। अधिकांश लोगों में आनुवंशिक प्रवृत्ति होने के बावजूद रोग विकसित नहीं होता।
2. पर्यावरणीय कारक (Environmental Factors)
कुछ बाहरी कारक रोग को सक्रिय कर सकते हैं, जैसे—
- धूम्रपान (Smoking)
- लगातार मानसिक तनाव (Chronic Stress)
- कुपोषण (Malnutrition)
- बार-बार एंटीबायोटिक उपयोग
- NSAID दर्दनाशक दवाओं का अत्यधिक प्रयोग
- शहरी जीवनशैली
3. आंत के माइक्रोबायोम में असंतुलन
मानव आंत में खरबों सूक्ष्मजीव रहते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से गट माइक्रोबायोम (Gut Microbiome) कहा जाता है।
स्वस्थ अवस्था में ये जीव—
- भोजन पचाने,
- विटामिन बनाने,
- प्रतिरक्षा संतुलन बनाए रखने
में सहायता करते हैं।
IBD में अच्छे और हानिकारक बैक्टीरिया के बीच संतुलन बिगड़ जाता है, जिसे डिस्बायोसिस (Dysbiosis) कहा जाता है। यह सूजन को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
प्रतिरक्षा प्रणाली की भूमिका
IBD मूलतः एक प्रतिरक्षा-मध्यस्थित (Immune-Mediated) रोग है।
सामान्य परिस्थितियों में प्रतिरक्षा प्रणाली बाहरी रोगजनकों—जैसे वायरस, बैक्टीरिया और फंगस—से रक्षा करती है। लेकिन IBD में प्रतिरक्षा प्रणाली आंत की अपनी कोशिकाओं तथा सामान्य माइक्रोबायोम को भी खतरे के रूप में पहचानने लगती है।
इस असामान्य प्रतिक्रिया के दौरान—
- TNF-α (Tumor Necrosis Factor Alpha)
- Interleukin-6 (IL-6)
- Interleukin-12 (IL-12)
- Interleukin-23 (IL-23)
जैसे सूजनकारी साइटोकाइन्स अत्यधिक मात्रा में बनने लगते हैं।
इसके परिणामस्वरूप आंत की दीवार लाल, सूजी हुई तथा क्षतिग्रस्त हो जाती है।
संभावित जटिलताएँ
यदि रोग लंबे समय तक नियंत्रित न रहे तो निम्न गंभीर जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं—
क्रोहन रोग में
- फिस्टुला (Fistula)
- आंत्र संकुचन (Strictures)
- आंत्र अवरोध (Bowel Obstruction)
- पोषण की कमी
अल्सरेटिव कोलाइटिस में
- गंभीर रक्तस्राव
- टॉक्सिक मेगाकोलन (Toxic Megacolon)
- कोलन कैंसर का बढ़ा हुआ जोखिम
दोनों स्थितियों में गंभीर मामलों में सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है।
निदान कैसे किया जाता है?
IBD का निदान केवल लक्षणों के आधार पर नहीं किया जा सकता।
आमतौर पर निम्न जांचें की जाती हैं—
- कोलोनोस्कोपी (Colonoscopy)
- एंडोस्कोपी (Endoscopy)
- बायोप्सी (Biopsy)
- सी-रिएक्टिव प्रोटीन (CRP)
- फीकल कैलप्रोटेक्टिन (Fecal Calprotectin)
- सीटी या एमआर एंटेरोग्राफी
कोलोनोस्कोपी और बायोप्सी को निदान का स्वर्ण मानक (Gold Standard) माना जाता है।
वर्तमान उपचार
1. सूजनरोधी दवाएँ (Anti-inflammatory Drugs)
प्रारंभिक रोगियों में 5-ASA (Mesalamine) तथा Corticosteroids का उपयोग किया जाता है।
इनका उद्देश्य सक्रिय सूजन को कम करना तथा रोग को रिमिशन अवस्था में लाना होता है।
2. इम्यूनोसप्रेसेंट्स (Immunosuppressants)
- Azathioprine
- 6-Mercaptopurine
- Methotrexate
जैसी दवाएँ प्रतिरक्षा गतिविधि को नियंत्रित करती हैं और लंबे समय तक रोग को शांत रखने में सहायता करती हैं।
3. बायोलॉजिक थेरेपी (Biologic Therapy)
बायोलॉजिक्स आधुनिक IBD उपचार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक हैं।
इनमें प्रमुख हैं—
- Infliximab
- Adalimumab
- Ustekinumab
- Risankizumab
ये दवाएँ विशिष्ट सूजनकारी अणुओं को लक्षित करती हैं और रोग की गंभीरता कम कर सकती हैं।
नई उम्मीद: इंटीग्रिन इन्हिबिटर्स
- हाल के वर्षों में शोधकर्ताओं का ध्यान इंटीग्रिन (Integrin) नामक कोशिकीय प्रोटीनों पर केंद्रित हुआ है।
- इंटीग्रिन प्रतिरक्षा कोशिकाओं को रक्त से निकलकर आंतों की दीवार तक पहुँचने में सहायता करते हैं।
- यदि इस प्रक्रिया को नियंत्रित किया जाए तो सूजन को काफी हद तक रोका जा सकता है।
Vedolizumab: लक्षित उपचार का उदाहरण
वेडोलिज़ुमैब (Vedolizumab) एक चयनात्मक इंटीग्रिन इन्हिबिटर है जो मुख्य रूप से आंत में कार्य करता है।
इसके लाभ—
- कम प्रणालीगत दुष्प्रभाव
- संक्रमण का अपेक्षाकृत कम जोखिम
- दीर्घकालिक प्रभावशीलता
प्रारंभिक और दीर्घकालिक अध्ययनों में उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हुए हैं।
जीवनशैली प्रबंधन
दवाओं के साथ-साथ जीवनशैली में सुधार भी महत्वपूर्ण है।
आहार
- संतुलित और पौष्टिक भोजन
- पर्याप्त प्रोटीन
- फल और सब्जियाँ
- पर्याप्त जल सेवन
तनाव नियंत्रण
- योग
- ध्यान
- प्राणायाम
- मनोवैज्ञानिक परामर्श
धूम्रपान से बचाव
विशेषकर क्रोहन रोग में धूम्रपान रोग को अधिक गंभीर बना सकता है।
उपचार : वर्तमान और नई आशाएँ
IBD एक ऐसी बीमारी है जो हर समय सक्रिय नहीं रहती। इसमें फ्लेयर-अप (भड़कन) और रिमिशन (शांत अवधि) के चक्र होते हैं। यही कारण है कि उपचार का मूल्यांकन करना मुश्किल हो जाता है – क्योंकि कभी-कभी रिमिशन अपने आप भी हो सकता है, न कि दवा के कारण।
1. पारंपरिक उपचार :
प्रारंभिक चरण: अधिकांश रोगियों को पहले एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएं (जैसे 5-ASA, कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स) दी जाती हैं, जो सूजन को कम करने और रिमिशन लाने का प्रयास करती हैं।
रिमिशन के बाद: लंबे समय तक शांति बनाए रखने के लिए इम्यूनोसप्रेसेंट्स (प्रतिरक्षा को दबाने वाली दवाएं) जैसे एज़ाथियोप्रीन या मेथोट्रेक्सेट दी जाती हैं। ये प्रतिरक्षा तंत्र को कम सक्रिय बनाते हैं, जिससे आंत को अपने आप ठीक होने का मौका मिलता है।
2. जैविक चिकित्सा (Biological Therapy) :
जब पुरानी दवाएं काम नहीं करतीं, तो बायोलॉजिक्स
का उपयोग किया जाता है। ये भी प्रतिरक्षा तंत्र को लक्षित करती हैं, लेकिन
ये मानव या जानवरों की कोशिकाओं से बनी प्रोटीन आधारित दवाएं होती हैं।
इन्फ्लिक्सिमैब (Infliximab) एक प्रसिद्ध उदाहरण है – यह एक एंटीबॉडी है जो विशेष सूजन कारक (TNF-alpha) को ब्लॉक करती है।
ये दवाएं कई रोगियों में प्रभावी होती हैं, लेकिन गंभीर दुष्प्रभाव (संक्रमण का खतरा) हो सकते हैं, और समय के साथ ये अपना प्रभाव खो सकती हैं।
3. नई उम्मीद : इंटीग्रिन इन्हिबिटर (Integrin Inhibitors)
शोधकर्ताओं का ध्यान अब इंटीग्रिन नामक प्रोटीन पर है। इंटीग्रिन वे अणु हैं जो कोशिकाओं को आपस में चिपकाए रखते हैं। IBD में, ये इंटीग्रिन प्रतिरक्षा कोशिकाओं को रक्त से बाहर निकलकर आंत की दीवार में घुसने में मदद करते हैं – जहाँ वे सूजन शुरू कर देती हैं।
समस्या यह है कि इंटीग्रिन पूरे शरीर में पाए जाते हैं। यदि कोई दवा सभी इंटीग्रिन को ब्लॉक कर दे, तो रक्त का थक्का जमना (clotting) बंद हो सकता है – जो खतरनाक है। समाधान : नई दवाएं (जैसे वेडोलिज़ुमैब) केवल एक विशिष्ट प्रकार के इंटीग्रिन को लक्षित करती हैं, जो केवल कुछ सफेद रक्त कोशिकाओं पर पाई जाती हैं जो IBD में महत्वपूर्ण हैं।
ये नई दवाएं अभी विदेशों में नियामक मंजूरी की लंबी प्रक्रिया से गुजर रही हैं। प्रारंभिक परीक्षणों में ये सुरक्षित और प्रभावी दिखी हैं। उम्मीद है कि आने वाले 4-5 वर्षों में ये कम गंभीर रोगियों के लिए भी उपलब्ध होंगी, न कि केवल उनके लिए जिन पर अन्य दवाएं असफल रही हैं।
निष्कर्ष
इन्फ्लेमेटरी बॉवल डिजीज (IBD) एक जटिल, प्रतिरक्षा-मध्यस्थित और दीर्घकालिक रोग है जो रोगी की शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक गुणवत्ता-जीवन को प्रभावित कर सकता है। यद्यपि इसका पूर्ण उपचार अभी उपलब्ध नहीं है, फिर भी आधुनिक चिकित्सा के माध्यम से अधिकांश रोगियों में रोग को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।
समय पर निदान, उचित दवा, नियमित चिकित्सकीय निगरानी, संतुलित आहार तथा स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर IBD से प्रभावित व्यक्ति सामान्य और सक्रिय जीवन जी सकते हैं। लगातार दस्त, पेट दर्द, मल में रक्त या अस्पष्ट वजन घटने जैसे लक्षणों को कभी भी सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
