आहार चिकित्सा (Diet Therapy)

Swadeshi Health
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आहार चिकित्सा (Diet Therapy) आहार-विज्ञान की वह शाखा है जो चिकित्सीय उद्देश्यों हेतु भोजन के उपयोग से संबंधित है। यह एक व्यापक अवधारणा है, जिसमें पोषण का व्यावहारिक उपयोग रोगों की रोकथाम तथा उनके सुधारात्मक उपचार के लिए किया जाता है। यह उचित एवं संतुलित आहार प्रदान करके रोग से उबरने तथा रोगों की रोकथाम पर केंद्रित होती है। उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु इसमें वर्तमान आहार एवं जीवनशैली में आवश्यक संशोधन भी सम्मिलित किए जा सकते हैं।

डाइट थेरेपी (Diet Therapy) पोषण विज्ञान की वह चिकित्सीय पद्धति है, जिसमें रोग की रोकथाम, नियंत्रण एवं उपचार हेतु रोगी की शारीरिक आवश्यकता के अनुसार संतुलित एवं चिकित्सकीय आहार प्रदान किया जाता है। यह शरीर की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करके रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, ऊतकों की मरम्मत करने तथा स्वास्थ्य पुनर्स्थापन में सहायक होती है। डाइट थेरेपी में रोग की अवस्था के अनुसार आहार की मात्रा, गुणवत्ता एवं पोषक तत्वों का वैज्ञानिक संशोधन किया जाता है। 

डाइट थेरेपी क्या है?

  • डाइट थेरेपी मतलब खाने-पीने की मदद से बीमारी का इलाज और बचाव करना।
  • इसमें सही पोषण और अच्छा भोजन देकर शरीर को स्वस्थ बनाया जाता है।
  • अच्छी डाइट से बीमारी जल्दी ठीक होने में मदद मिलती है और कई रोगों से बचाव भी होता है।
  • बेहतर स्वास्थ्य के लिए खाने की आदतों और लाइफस्टाइल में बदलाव करना भी डाइट थेरेपी का हिस्सा है। 

डाइट थेरेपी के चिकित्सीय सिद्धांत

डाइट थेरेपी के मुख्य उद्देश्य एवं सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

  • रोगी की पोषणीय स्थिति (Nutritional Status) को बनाए रखना।
  • पोषक तत्वों की कमी एवं रोग संबंधी विकारों का सुधार करना।
  • प्रभावित अंगों एवं शरीर को शारीरिक विश्राम प्रदान करना।
  • पोषक तत्वों के पाचन, अवशोषण एवं मेटाबॉलिज्म को सुचारु बनाना।
  • चिकित्सीय आवश्यकता के अनुसार शरीर के वजन का नियंत्रण या संशोधन करना।

थेराप्यूटिक डाइट (Therapeutic Diet)

डाइट थेरेपी के अंतर्गत रोगी की चिकित्सीय आवश्यकता के अनुसार विशेष आहार योजनाएँ एवं नियंत्रित भोजन व्यवस्था निर्धारित की जाती है, जिन्हें थेराप्यूटिक डाइट कहा जाता है। यह सामान्य आहार का संशोधित रूप होता है, जिसमें विशिष्ट पोषक तत्वों, खाद्य पदार्थों अथवा कैलोरी की मात्रा को रोग की स्थिति के अनुसार नियंत्रित किया जाता है। थेराप्यूटिक डाइट का उद्देश्य रोग प्रबंधन, पोषण संतुलन बनाए रखना तथा स्वास्थ्य पुनर्स्थापन में सहायता करना होता है।
ऐसी आहार योजनाएँ सामान्यतः डायटीशियन, न्यूट्रिशनिस्ट एवं चिकित्सकों द्वारा निर्धारित की जाती हैं। 

उदाहरण:
स्वच्छ तरल आहार (Clear Liquid Diet), मधुमेह आहार (Diabetic Diet), वृक्क आहार (Renal Diet), ग्लूटेन-मुक्त आहार (Gluten Free Diet), कम वसा वाला आहार (Low Fat Diet), उच्च रेशा युक्त आहार (High Fibre Diet) आदि।

अस्पताल में दिए जाने वाले आहार (Hospital Diet)

अस्पताल के आहार को आगे निम्न भागों में बाँटा जाता है:
a) तरल आहार (Liquid Diet)
b) सामान्य आहार (Normal Diet)
c) नरम आहार (Soft Diet)

तरल आहार को आगे दो भागों में बाँटा जाता है:
a) साफ तरल आहार (Clear Fluid Diet)
b) पूर्ण तरल आहार (Full Fluid Diet)

तो डाइट थेरेपी है - 

डाइट थेरेपी का तात्पर्य रोग से स्वस्थ होने की प्रक्रिया में उपयुक्त खाद्य पदार्थों के उपयोग से है। सभी चिकित्सीय आहार सामान्य आहार के संशोधित रूप होते हैं, जिन्हें रोग के कारण उत्पन्न परिवर्तित आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु तैयार किया जाता है। 

डाइट थेरेपी एक चिकित्सीय पोषण पद्धति है, जिसमें रोग से उबरने एवं स्वास्थ्य पुनर्स्थापन के लिए उपयुक्त आहार का उपयोग किया जाता है। सभी थेराप्यूटिक डाइट सामान्य आहार के संशोधित रूप होते हैं, जिन्हें रोगजनित परिवर्तित पोषणीय एवं शारीरिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर निर्धारित किया जाता है। 

नॉर्मल डाइट / रूटीन हॉस्पिटल डाइट

  • नॉर्मल डाइट को Recommended Dietary Allowances (RDA) एवं दैनिक पोषण आवश्यकताओं के अनुसार इस प्रकार नियोजित किया जाता है कि स्वस्थ व्यक्तियों की शारीरिक एवं पोषणीय आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।
  • इसका मुख्य उद्देश्य संतुलित एवं नियोजित आहार द्वारा आवश्यक पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा प्रदान करना है।
  • रोगी अथवा व्यक्ति की पोषणीय आवश्यकताएँ उसकी शारीरिक गतिविधि, चयापचय दर तथा विशिष्ट पोषक तत्वों की बढ़ी या घटी हुई मांग पर निर्भर करती हैं, जिन्हें डाइट प्लानिंग के समय ध्यान में रखा जाता है।
  • नॉर्मल डाइट को सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार संशोधित एवं अनुकूलित किया जा सकता है। 

सामान्य आहार में परिवर्तन (Modifications of Normal Diet)

सामान्य आहार में निम्नलिखित प्रकार के संशोधन किए जा सकते हैं:

  • खाद्य पदार्थों की स्थिरता एवं बनावट में परिवर्तन, जैसे – द्रव आहार, मृदु आहार, कम रेशा युक्त आहार एवं अधिक रेशा युक्त आहार।
  • आहार के ऊर्जा मान (Energy Value) में वृद्धि अथवा कमी, जैसे – वजन घटाने हेतु निम्न कैलोरी आहार तथा जलन (Burns) की अवस्था में उच्च कैलोरी आहार।
  • विशिष्ट पोषक तत्वों अथवा खाद्य पदार्थों की मात्रा में वृद्धि या कमी, जैसे – सोडियम-प्रतिबंधित आहार, लैक्टोज-प्रतिबंधित आहार, उच्च रेशा युक्त आहार तथा उच्च पोटैशियम आहार।
  • मसालों एवं स्वादवर्धक पदार्थों का निष्कासन, जैसे – सादा आहार (Bland Diet)। 
  • विशिष्ट खाद्य पदार्थों को आहार से हटाना, जैसे – एलर्जी संबंधी आहार एवं ग्लूटेन-मुक्त आहार।
  • प्रोटीन, वसा तथा कार्बोहाइड्रेट के अनुपात एवं संतुलन में आवश्यक समायोजन करना, जैसे – मधुमेह आहार, वृक्क आहार तथा कोलेस्ट्रॉल कम करने वाले आहार।

टेस्ट डाइट (Test Diets):

टेस्ट डाइट ऐसे नियंत्रित चिकित्सीय आहार होते हैं, जिन्हें विशिष्ट नैदानिक परीक्षणों (Diagnostic Tests) के दौरान रोगी को अल्प अवधि के लिए प्रदान किया जाता है।
उदाहरण – Fat Absorption Test, जिसका उपयोग Steatorrhoea की पहचान हेतु किया जाता है। फैट एब्जॉर्प्शन टेस्ट, जिसका उपयोग यह पता लगाने के लिए किया जाता है कि स्टिएटोरिया (Steatorrhoea) है या नहीं।

रोग की अवस्था के अनुसार भोजन की आवृत्ति (Meal Frequency), Feeding Intervals तथा भोजन की संख्या एवं समय-सारणी में चिकित्सीय संशोधन किए जाते हैं, जैसे – Diabetic Diet एवं Peptic Ulcer Disease Diet।

A. परिवर्तित Consistency वाले आहार

Liquid Diet एवं Soft Diet

  • Liquid Diet को आगे Clear Liquid Diet तथा Full Liquid Diet में वर्गीकृत किया जाता है।
  • ये आहार सामान्यतः ज्वर (Fever), Post-Operative अवस्था तथा उन रोगियों के लिए निर्धारित किए जाते हैं जो Solid Foods को सहन नहीं कर पाते।
  • चूँकि इन आहारों में पोषक तत्व Diluted रूप में होते हैं, इसलिए Feeding Intervals को कम किया जाता है तथा Feeds की संख्या बढ़ाकर छह या उससे अधिक कर दी जाती है।
  • इनमें चाय, कॉफी, Clear Fruit Juices, Coconut Water, Sherbets, Dal Extracts, Rice Water, Popped Cereals Extracts, Fat-Free Broth तथा Carbonated Drinks शामिल होते हैं।
  • Feeds को लगभग 20–25 ml की छोटी मात्रा में प्रत्येक 1–2 घंटे के अंतराल पर दिया जाता है तथा रोगी की स्थिति में सुधार होने पर मात्रा को धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है।
  • Liquid Diet शरीर में Fluid एवं Electrolyte Balance बनाए रखने, प्यास कम करने तथा शल्यक्रिया या संक्रमण के बाद पाचन तंत्र (Digestive System) को पुनः सक्रिय करने में सहायक होती है।

फुल फ्लूड डाइट (Full Fluid Diet)

  • Full Fluid Diet में ऐसे तरल एवं अर्द्ध-तरल खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं, जो Body Temperature पर Liquid Form में परिवर्तित हो जाते हैं।
  • यह आहार Iron को छोड़कर अधिकांश आवश्यक पोषक तत्वों की पर्याप्त पूर्ति करने में सक्षम होता है।
  • चूँकि इस डाइट की Nutrient Density अपेक्षाकृत कम होती है, इसलिए रोगी को दिन में छह या उससे अधिक Feeding Sessions दिए जाते हैं।
  • डाइट के Protein Content को बढ़ाने के लिए इसमें Skim Milk Powder सम्मिलित किया जाता है।

Full Liquid Diet निम्न चिकित्सीय अवस्थाओं में Prescribe की जाती है:

  • (i) Post-Operative अवस्था में, Clear Liquid Diet Phase के बाद। यानी शल्यक्रिया (Operation) के पश्चात, स्वच्छ द्रव आहार चरण के बाद।
  • (ii) Short Duration Acute Infections की स्थिति में। यानी अल्पकालिक तीव्र संक्रमण की अवस्था में।
  • (iii) Acute Gastrointestinal Disturbances में, Clear Liquid Diet के पश्चात। यानी तीव्र पेट एवं आंतों की समस्या (Acute Gastrointestinal Upset) में, क्लियर-लिक्विड डाइट के बाद।
  • (iv) उन परिस्थितियों में, जब रोगी Mastication (Chewing) करने में असमर्थ हो। यानी ऐसी स्थिति में जब रोगी भोजन चबाने में असमर्थ हो।

 सॉफ्ट चिकित्सीय आहार (Therapeutic Soft Diet)

  • सॉफ्ट डाइट का प्रिस्क्रिप्शन प्रायः फुल-फ्लुइड डाइट के पश्चात एवं सामान्य आहार की ओर संक्रमण अवस्था में किया जाता है।
  • यह आहार न्यूट्रिशनली एडिक्वेट माना जाता है। यानी यह शरीर को पर्याप्त पोषण प्रदान करती है।
  • इसमें ऐसे खाद्य पदार्थ सम्मिलित रहते हैं जो सलाइवा के साथ सहजता से मिश्रित होकर आसानी से डिग्लूटिशन (Deglutition) एवं डाइजेशन की प्रक्रिया पूर्ण करें। यानी इसमें ऐसे खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं जो आसानी से चबाए, निगले और पचाए जा सकें।
  • कठोर फाइबर, प्रबल फ्लेवर तथा उच्च वसा युक्त खाद्य पदार्थों को निषिद्ध रखा जाता है। यानी अधिक रेशेदार, तीखे स्वाद वाले तथा अधिक वसा युक्त खाद्य पदार्थों से परहेज किया जाता है।
  • सॉफ्ट डाइट की प्रमुख वैरायटीज़ में मैकेनिकली सॉफ्ट डाइट, प्यूरीड डाइट तथा फाइबर-रिस्ट्रिक्टेड सॉफ्ट डाइट सम्मिलित हैं। यानी 

मैकेनिकली सॉफ्ट डाइट (Mechanically Soft Diet)

  • इस आहार में सामान्य भोजन में केवल उसकी बनावट (Texture) के आधार पर संशोधन किया जाता है।
  • इसे डेंटल सॉफ्ट डाइट भी कहा जाता है, क्योंकि यह उन रोगियों को दी जाती है जो दांतों की अनुपस्थिति, दांत निकलवाने अथवा ठीक से फिट न होने वाले कृत्रिम दांतों (Dentures) के कारण चबा नहीं पाते।

प्यूरीड चिकित्सीय आहार (Therapeutic Pureed Diet)

  • प्यूरीड डाइट में ऐसे खाद्य पदार्थ सम्मिलित होते हैं जो मुलायम, चिकने तथा लगभग बिना चबाए निगले जा सकें। यानी प्यूरीड डाइट में ऐसे खाद्य पदार्थ सम्मिलित किए जाते हैं जिनकी संरचना स्मूथ एवं सॉफ्ट होती है तथा जिनके लिए न्यूनतम मास्टिकेशन आवश्यक होता है।
  • यह आहार उन रोगियों के लिए उपयुक्त है जिन्हें निगलने में कठिनाई होती है। यानी यह आहार विशेष रूप से डिस्फेजिया (Dysphagia) अथवा डिग्लूटिशन में कठिनाई वाले रोगियों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
  • जो खाद्य पदार्थ पहले से मुलायम या चिकने नहीं होते, उन्हें मिक्सर में ब्लेंड अथवा प्यूरी बनाया जाता है। यानी जो खाद्य पदार्थ स्वाभाविक रूप से सॉफ्ट या स्मूथ नहीं होते, उन्हें ब्लेंडर अथवा मिक्सर में प्यूरीकृत किया जाता है।
  • रोगी की आवश्यकता अनुसार उचित गाढ़ापन (Consistency) प्राप्त करने के लिए तरल पदार्थ मिलाए जाते हैं। यानी रोगी की आवश्यकता अनुसार उपयुक्त कंसिस्टेंसी प्राप्त करने हेतु तरल पदार्थ जोड़े जाते हैं। 
  • कैलोरी बढ़ाने हेतु इसमें वसा तथा/अथवा शर्करा मिलाई जाती है। यानी कैलोरिक वैल्यू बढ़ाने के उद्देश्य से इसमें फैट तथा/अथवा शर्करा का समावेश किया जाता है।

A. सॉफ्ट फाइबर-रिस्ट्रिक्टेड डाइट (Soft Fibre Restricted Diet)

  • इस आहार में अपाच्य कार्बोहाइड्रेट जैसे सेल्यूलोज, हेमिसेल्यूलोज, लिग्निन, पेक्टिक पदार्थ, गम्स एवं म्यूसिन को निष्कासित किया जाता है।
  • आहार में अपाच्य कार्बोहाइड्रेट की मात्रा निम्न प्रकार से कम की जा सकती है—
    (क) परिष्कृत अनाज एवं ब्रेड का उपयोग
    (ख) कोमल एवं अपरिपक्व सब्जियों का सेवन
    (ग) बिना छिलके एवं बीज वाले फलों का उपयोग
    (घ) पकी हुई सब्जियों एवं फलों का सेवन

B. मात्रा-आधारित आहार संशोधन (Quantitative Dietary Modification)

  • क्लिनिकल कंडीशन के अनुसार कुछ रोगियों में रेस्ट्रिक्टेड डाइट की आवश्यकता होती है।
  • उदाहरणतः—
    • सोडियम-रिस्ट्रिक्टेड डाइट — हाइपरटेंशन में यानी उच्च रक्तचाप में कम नमक वाला आहार
    • प्यूरिन-रिस्ट्रिक्टेड डाइट — गाउट में यानी गाउट में कम प्यूरिन वाला आहार
    • लो-रेज़िड्यू डाइट — फीकल आउटपुट की आवृत्ति एवं आयतन को कम करने हेतु, विशेषतः एब्डॉमिनल सर्जरी से पूर्व अथवा पश्चात प्रिस्क्राइब की जाती है। यानी लो-रेज़िड्यू डाइट, जो पेट की सर्जरी से पहले या बाद में दी जाती है ताकि मल की मात्रा और बार-बार होने वाले मल त्याग को कम किया जा सके।

C. पोषक तत्त्वों (प्रोटीन, वसा एवं कार्बोहाइड्रेट) की मात्रा में संशोधन

  • पोषक तत्त्वों की मात्रा में परिवर्तन पोषण-अभाव की पूर्ति, शरीर के भार में परिवर्तन अथवा उच्च रक्तचाप एवं मधुमेह जैसे रोगों के नियंत्रण हेतु किया जाता है। यानी डाइट के न्यूट्रिएंट कंटेंट में परिवर्तन न्यूट्रिशनल डिफिशिएंसी के उपचार, बॉडी वेट मॉडिफिकेशन तथा हाइपरटेंशन एवं डायबिटीज मेलिटस जैसे रोगों के नियंत्रण हेतु किया जाता है।
  • हृदय रोग से ग्रस्त रोगियों को नियंत्रित वसा एवं कम कोलेस्ट्रॉल वाला आहार दिया जाता है, जबकि वृक्क-विफलता (Renal Failure) तथा उन्नत यकृत रोगों से पीड़ित रोगियों को कम प्रोटीन वाला आहार निर्धारित किया जाता है। यानी कार्डियोवैस्कुलर डिजीज वाले रोगियों हेतु फैट-कंट्रोल्ड एवं लो-कोलेस्ट्रॉल डाइट निर्धारित की जाती है, जबकि रीनल फेल्योर एवं एडवांस्ड हेपेटिक डिजीज वाले रोगियों को लो-प्रोटीन डाइट प्रिस्क्राइब की जाती है।

D. भोजन की आवृत्ति में परिवर्तन (Changes in Meal Frequency)

  • गैस्ट्रो-इसोफेजियल रिफ्लक्स रोग (GERD) से पीड़ित व्यक्तियों को कम मात्रा में किंतु बार-बार भोजन करने से लाभ होता है। यानी गैस्ट्रो-ओसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज (GERD) से ग्रस्त व्यक्तियों में स्मॉल एवं फ्रीक्वेंट मील्स का सेवन लाभकारी सिद्ध होता है।
  • ऐसे रोगियों को दिन में तीन सामान्य भोजन के स्थान पर 5 से 6 छोटे भोजन लेने की सलाह दी जाती है।

E. भोजन पकाने की विधि में परिवर्तन (Changes in Method of Cooking)

  • वृद्ध व्यक्तियों में भोजन को मैशिंग, ब्लेंडिंग अथवा चॉपिंग जैसी यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा संशोधित किया जा सकता है। यानी बुजुर्ग लोगों के लिए भोजन को मसलकर, पीसकर या छोटे टुकड़ों में काटकर तैयार किया जा सकता है। 
  • ब्लैंड डाइट पर रहने वाले रोगियों के लिए भाप में पके हुए (Steamed), बेक किए हुए अथवा ग्रिल किए हुए खाद्य पदार्थों की अनुशंसा की जाती है। यानी ब्लैंड डाइट लेने वाले मरीजों को उबला, भाप में पका, बेक किया हुआ या ग्रिल किया हुआ भोजन खाने की सलाह दी जाती है।

F. भोजन प्रदान करने की विधि में संशोधन (Modification in the Method of Feeding)

  • पर्याप्त पोषण प्रदान करने हेतु सामान्यतः मौखिक आहार (मुख द्वारा भोजन) की अनुशंसा की जाती है। यानी शरीर को पर्याप्त पोषण देने के लिए सामान्यतः मुंह से भोजन कराया जाता है। 
  • कुछ परिस्थितियों में मौखिक आहार संभव नहीं हो पाता। ऐसी अवस्था में विशेष आहार-प्रदाय विधियों, जैसे एंटरल फीडिंग तथा पैरेंट्रल फीडिंग का उपयोग किया जाता है। यानी ऐसी स्थिति में विशेष फीडिंग विधियों का उपयोग किया जाता है, जैसे— एंटरल फीडिंग और पैरेंट्रल फीडिंग।
  • एंटरल फीडिंग में तरल फॉर्मूला आहार को नासोगैस्ट्रिक फीडिंग ट्यूब के माध्यम से दिया जाता है। यानी एंटरल फीडिंग में तरल आहार को नाक से पेट तक डाली गई ट्यूब के माध्यम से दिया जाता है।
  • पैरेंट्रल फीडिंग में जल, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, खनिज एवं विटामिन युक्त द्रवों को परिधीय एवं केंद्रीय शिराओं के माध्यम से प्रदान किया जाता है। यानी पैरेंट्रल फीडिंग में पानी, ग्लूकोज, अमीनो एसिड, खनिज और विटामिन युक्त द्रव नसों के माध्यम से दिए जाते हैं।

डाइटरी काउंसलिंग (Dietary Counselling)

  • यह देखा गया है कि कुपोषित रोगियों को स्वस्थ होने में अधिक समय लगता है।
  • अतः पोषण मूल्यांकन (Nutritional Assessment) सभी रोगियों की देखभाल का नियमित भाग होना चाहिए।
  • सभी रोगियों में विस्तृत मूल्यांकन आवश्यक नहीं होता।
  • नैदानिक अवलोकन (Clinical Observation) की सरल विधि द्वारा कुपोषण के जोखिम वाले रोगियों की पहचान की जा सकती है।

पोषण जोखिम मूल्यांकन - कॉम्प्रिहेन्सिव न्यूट्रिशनल असेसमेंट

  • केवल उन रोगियों को विस्तृत पोषण मूल्यांकन (Comprehensive Nutritional Assessment) की आवश्यकता होती है जो पोषण संबंधी जोखिम में हों। यानी केवल न्यूट्रिशनल रिस्क वाले रोगियों को व्यापक पोषण मूल्यांकन से गुजरना आवश्यक होता है।
  • पोषण इतिहास (Nutrition History) एवं नैदानिक मूल्यांकन (Clinical Evaluation) द्वारा ऐसे व्यक्तियों की पहचान की जा सकती है जो पोषण की दृष्टि से जोखिमग्रस्त हों। यानी न्यूट्रिशन हिस्ट्री एवं क्लिनिकल इवैल्युएशन द्वारा उन व्यक्तियों की पहचान की जा सकती है जो न्यूट्रिशनली एट-रिस्क हों।
  • नैदानिक अवलोकनों के आधार पर जब समस्या की प्रकृति, सीमा एवं कारण निर्धारित हो जाते हैं, तब पोषण देखभाल (Nutritional Care) की योजना बनाई जा सकती है। यानी क्लिनिकल ऑब्जर्वेशन के आधार पर जब समस्या की प्रकृति, व्यापकता एवं कारण का निर्धारण हो जाता है, तब न्यूट्रिशनल केयर प्लान तैयार किया जाता है।

 चिकित्सीय आहार की योजना (Planning of Therapeutic Diet)

  • रोगी की ऊर्जा आवश्यकता इस प्रकार निर्धारित की जानी चाहिए कि वह उसकी आधारभूत चयापचय आवश्यकताओं (Basal Needs) तथा शारीरिक गतिविधियों की आवश्यकताओं को पूर्ण कर सके।
  • साथ ही, रोगी की पोषण पूर्ति (Repletion), वर्तमान स्थिति बनाए रखने (Maintenance) अथवा भार घटाने (Weight Loss) की आवश्यकता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

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