आहार शब्द सुनते ही असंख्य कल्पनाएँ हमारे मस्तिष्क में आती हैं। हम खाने-पीने के अतिरिक्त यह भी सोचते हैं कि हम कहाँ, किन लोगों के साथ और कैसे खाते हैं आहार हमारे जीवन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, साथ ही हमारे अस्तित्व से जुड़ा रहता है। शायद यह हमारे जीवन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। आहार छोटी-छोटी इकाइयों से मिलकर बनता है, जो हमारे शरीर को पोषण देता है। इनकी आवश्यकता अलग-अलग मात्रा में शरीर के विभिन्न अंगों को विशिष्ट कार्य सम्पन्न करने में होती है। तात्पर्य यह है कि अच्छा पोषण, अच्छे स्वास्थ्य के लिये आवश्यक होता है। यदि हमारे आहार में आवश्यक पोषक तत्त्व गलत मात्रा में हों, आवश्यकता से अधिक या कम हों, तो हमारे शरीर में पोषक तत्त्वों का असंतुलन हो जाता है। ऐसी स्थिति में कई बीमारियाँ हो जाती हैं।
इस लेख में हम पढ़ेंगे कि भोजन या ‘आहार’ जीवन के लिये क्यों आवश्यक है, इसके क्या-क्या कार्य हैं तथा क्या-क्या तत्त्व हैं। आपको इसमें ‘पोषण’ तथा ‘पोषक तत्त्वों’ जैसे शब्दों के बारे में भी बताया जायेगा। इन्हें जानने के बाद आप पोषक तत्त्वों के स्रोत तथा कार्यों के बारे में जानकारी हासिल करेंगे तथा विभिन्न व्यक्तियों को कितनी मात्रा में इनकी आवश्यकता है, यह भी जान सकेंगे।
1.1 आहार क्या है?
आहार शब्द ऐसी प्रत्येक वस्तु के लिये प्रयुक्त होता है जो हम खाते हैं तथा जो हमारे शरीर का पोषण करता है। यानी कोई भी पदार्थ जिसे हम खा सकें तथा जो शरीर का पोषण करे, आहार कहलाता है। इसमें वे सब तत्त्व हैं जो हमारे शरीर में महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। इसमें ठोस, अर्द्धठोस तथा तरल सभी प्रकार के खाद्य पदार्थ शामिल रहते हैं। इस प्रकार, खाद्य पदार्थों में निम्नलिखित दो विशेषताएँ होनी आवश्यक हैं :–
- (i) पदार्थ खाने योग्य होना चाहिए।
- (ii) पदार्थ से शरीर को पोषण मिलना चाहिए।
1.2. भोजन के कार्य - भोजन के मुख्यतः तीन कार्य हैं :–
(1) सामाजिक कार्य
भोजन और खाना एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक अर्थ रखता है। किसी अन्य व्यक्ति के साथ मिलजुल कर भोजन करने से सामंजस्य की भावना विकसित होती है। विश्व भर में भोजन किसी भी आयोजन का एक अंतरंग हिस्सा होता है। आपने देखा होगा कि बच्चे के जन्मदिन पर या परिवार में शादी-विवाह और अन्य शुभ अवसरों पर दावत दी जाती है और उसमें स्वादिष्ट व्यंजन खिलाये जाते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों में भी भोजन का विशेष महत्त्व होता है।
(2) मनोवैज्ञानिक कार्य
हम सबकी कुछ भावनात्मक आवश्यकताएँ होती हैं जैसे सुरक्षा, प्रेम और आदर-सत्कार। इन भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति का भोजन एक माध्यम है। उदाहरणार्थ जब आपकी माँ आपकी पसंद का भोजन तैयार करती है तब आपको कैसा लगता है? आपको महसूस होता है कि माँ आपको प्यार करती है और आपका ध्यान रखती है।
कभी-कभी भोजन पुरस्कार के रूप में भी दिया जाता है। क्या आपको याद है जब आपने बच्चे को अच्छा कार्य करने पर इनाम के रूप में चॉकलेट दी हो? इसी प्रकार कुछ खाद्य पदार्थ बीमारी के साथ जुड़ जाते हैं जैसे खिचड़ी या सादा भोजन। रोगावस्था में एक दुःखद सी अनुभूति होती है। अतः उस समय दिया गया भोजन भी मनोवैज्ञानिक रूप से उन्हीं भावनाओं से जुड़ जाता है।
(3) शारीरिक कार्य
भोजन हमारे शरीर के लिये तीन विशिष्ट कार्य करता है— ऊर्जा प्रदान करना, शरीर विकसित करना तथा शारीरिक क्रियाओं को नियमित करना और रोगों से सुरक्षित रखना।
(i) भोजन ऊर्जा प्रदान करता है
- प्रत्येक मनुष्य को काम करने के लिये ऊर्जा की आवश्यकता होती है। घर या बाहर कहीं भी घूमने, खाने और काम करने सभी में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। जो भोजन आप करते हैं उससे यह शक्ति प्राप्त होती है।
- विश्राम करते समय भी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। क्या आप बता सकते हैं क्यों? क्योंकि आपके शरीर के अंदर कुछ क्रियाएँ निरंतर होती रहती हैं, जैसे हृदय द्वारा रक्त-संचालन, उदर द्वारा भोजन का पाचन, फेफड़ों द्वारा श्वास क्रिया आदि। सभी को अपनी-अपनी क्रिया करने के लिये ऊर्जा की आवश्यकता होती है। भोजन हमें यह शक्ति देता है।
(ii) भोजन शरीर के विकास में सहायक होता है
- क्या आपने कभी सोचा है कि एक शिशु वयस्क कैसे बन जाता है? हमारा शरीर हजारों छोटी-बड़ी कोशिकाओं से मिलकर बनता है। शरीर को विकसित करने के लिये नयी-नयी कोशिकाएँ बनती रहती हैं। इन कोशिकाओं के बनने में भोजन का प्रमुख योगदान है।
- ये कोशिकाएँ कभी-कभी चोट से नष्ट या क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, तब इनकी जगह नयी कोशिकाएँ बनती हैं। कोशिकाओं की मरम्मत भोजन द्वारा होती है। इस प्रकार भोजन शरीर को बनाने, विकसित करने और उसे ठीक करने का कार्य करता है।
(iii) भोजन शरीर की क्रियाओं को नियमित करता है तथा रोग से शरीर की रक्षा करता है
- शरीर के अंदर प्रकट होने वाले रोगों और उनके कीटाणुओं से लड़ने की शक्ति हमें भोजन से ही मिलती है। हमारे शरीर में जो क्रियाएँ निरंतर स्वतः होती रहती हैं उनका नियंत्रण और उनका सुचारु रूप से चलना हमारे भोजन पर निर्भर है।
- श्वसन क्रिया, रक्त-संचालन, पाचन, मल-निष्कासन — ये सब क्रियाएँ भोजन द्वारा ही व्यवस्थित और नियमित होती हैं। हमारे शरीर का तापमान 98.6 डिग्री फॉरेनहाइट या 37 डिग्री सेंटीग्रेड रहता है। इसी प्रकार हृदय की गति लगभग 72 प्रति मिनट होती है।
- शरीर से मल निष्कासन नियमित रूप से होना आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं होता तो कई गड़बड़ियाँ हो सकती हैं जैसे ‘कब्ज’ का रोग। भोजन द्वारा ही ये समस्त कार्य सुचारु और नियमित रूप से चलते हैं।
1.3. पोषण तथा पोषक तत्त्व
आइये पोषण के बारे में पढ़ें। हम सभी भोजन करते हैं। भोजन शरीर का पोषण करता है तथा शरीर को स्वस्थ रखता है। हम जो भोजन करते हैं वह विभिन्न प्रक्रियाओं से होकर गुजरता है जैसे पाचन, अवशोषण और फिर शरीर के विभिन्न भागों में रक्त संचार द्वारा प्रयुक्त होता है। जिस भोजन का पाचन व अवशोषण नहीं हो पाता है वह निष्कासित कर दिया जाता है।
पोषण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा भोजन शरीर द्वारा ग्रहण किया जाता है और उपयोग में लाया जाता है।
पोषण → भोजन खाना → पचना → रक्त में घुलना → विभिन्न अंगों में पहुँचना → शरीर द्वारा प्रयुक्त होना
1.4. पोषक तत्त्व तथा उनके कार्य
हम सभी जानते हैं कि पोषक तत्त्व भोजन में उपस्थित वे रासायनिक पदार्थ हैं जो शरीर को पोषण देने के लिये उत्तरदायी हैं। भोजन हमारे शरीर को पोषण व स्वास्थ्य प्रदान करता है। भोजन में निहित पोषक तत्त्वों द्वारा शरीर को पोषण मिलता है। प्रश्न यह है कि ये पोषक तत्त्व कौन से हैं? पोषक तत्त्व दो प्रकार के होते हैं :–
(1) वृहद् पोषक तत्त्व
(2) सूक्ष्म पोषक तत्त्व
अच्छे स्वास्थ्य के लिये वृहद् और सूक्ष्म दोनों ही पोषक तत्त्व आवश्यक हैं। शरीर के लिये दोनों का ही महत्त्वपूर्ण कार्य है।
1.5.- वृहद् पोषक तत्त्व
ये भोजन में बड़ी मात्रा में उपस्थित रहते हैं और शरीर के लिये बड़ी मात्रा में आवश्यक होते हैं।
कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा एवं तेल वृहद् पोषक तत्त्वों की श्रेणी में आते हैं।
(1.5.a) कार्बोहाइड्रेट या शर्करा
(i) प्राप्य कार्बोहाइड्रेट
स्टार्च, कन्द, अनाज, दाल, आलू आदि में बड़ी मात्रा में शर्करा होती है। ये साधारण शर्करा के रूप में चीनी, गुड़, फल, शहद और दूध में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहते हैं। स्टार्च और शक्कर आसानी से पाच्य होते हैं व शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं।
(ii) अप्राप्य शर्करा अथवा आहारीय रेशे
इस प्रकार के कार्बोहाइड्रेट भोजन में सेल्यूलोज़ या हेमीसेल्यूलोज़ के रूप में पाये जाते हैं जो कि शरीर द्वारा अपाच्य होते हैं। इनसे मल की वृद्धि होती है तथा इनसे मल निष्कासन में मदद मिलती है।
शरीर में कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन से ऊर्जा प्राप्त होती है। किन्तु शर्करा, ऊर्जा प्राप्त करने का सबसे सस्ता स्रोत है। यदि आपके शरीर में शर्करा तथा वसा से पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिल पा रही है तब शरीर प्रोटीन से ऊर्जा लेने का कार्य करता है। अतः प्रोटीन से शरीर की उचित संरचना हो सके, इसके लिये आवश्यक है कि कार्बोहाइड्रेट और वसा पर्याप्त मात्रा में शरीर में रहें।
किलो कैलोरी भोजन में ऊर्जा का एक मापक है।
कार्बोहाइड्रेट के कार्य इस प्रकार हैं :–
• शर्करा ऊर्जा का मुख्य स्रोत है।
• उचित मात्रा में शर्करा के प्रयोग से प्रोटीन की बचत शरीर संरचना के लिये होती है।
• आहारीय रेशे मल वृद्धि करके मल त्याग की प्रक्रिया को आसान कर देते हैं।
शर्करा के आहारीय स्रोत हैं :–
• अनाज — गेहूँ, चावल, बाजरा, मक्का आदि
• कन्द-मूल — आलू, शकरकंदी, चुकन्दर और टैपियोका
• शक्कर, गुड़
• दालें — राजमा, चना व अन्य सभी दालें
(1.6.b) प्रोटीन
शारीरिक संरचना के लिये प्रोटीन की आवश्यकता होती है। एक ग्राम प्रोटीन से 4 किलो कैलोरी ऊर्जा मिलती है। प्रोटीन छोटे-छोटे पदार्थों से मिलकर बनते हैं जिन्हें अमीनो अम्ल कहते हैं। ये कुल 22 होते हैं, जिनमें से 8 ऐसे होते हैं जो हमारे शरीर द्वारा निर्मित नहीं हो सकते। इन्हें आवश्यक अमीनो अम्ल कहते हैं और इन्हें भोजन से ही प्राप्त किया जा सकता है। बाकी अन्य सभी अमीनो अम्ल हमारा शरीर बना लेता है।
प्रोटीन के कार्य तथा स्रोत
कार्य
- (i) शरीर के तन्तुओं की वृद्धि, मरम्मत तथा रखरखाव के लिये आवश्यक हैं।
- (ii) एन्जाइम, हार्मोन, हीमोग्लोबिन तथा प्रतिपिंड (एंटीबॉडीज़) के निर्माण के लिये आवश्यक हैं।
- (iii) रक्त जमने में सहायक हैं।
- (iv) आवश्यकता पड़ने पर ऊर्जा प्रदान करते हैं।
स्रोत
• मांस, मुर्गे, मछली, अण्डे
• दूध, चीज़, पनीर, दही
• सोयाबीन, मटर, दालें
• अनाज, सूखे मेवे, तिलहन जैसे तिल, मूँगफली आदि
विशेषताएँ
- (i) पशुओं से प्राप्त प्रोटीन जैसे मांस, अण्डा, दूध आदि, वनस्पति से प्राप्त प्रोटीन जैसे दालें, अनाज आदि की अपेक्षा बेहतर गुणवत्ता वाले होते हैं।
- (ii) प्रत्येक आहार में एक या अधिक प्रोटीन के स्रोतों का समावेश करने से हमें पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन प्राप्त हो जाता है।
नोट : जब शरीर को उचित मात्रा में कार्बोहाइड्रेट तथा वसा नहीं मिलते तो प्रोटीन ऊर्जा की आवश्यकता को पूर्ण करते हैं तथा वे शरीर संरचना जैसे जरूरी कार्य के लिये उपलब्ध नहीं हो पाते।
(1.7.c) वसा व तेल
वसा व तेल हमारे भोजन में ऊर्जा के केन्द्रित स्रोत हैं। 1 ग्राम वसा से 9 किलो कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। वसा छोटी-छोटी इकाइयों, जिन्हें फैटी अम्ल कहते हैं, से मिलकर बनता है। वसा की प्रकृति उसमें उपस्थित फैटी अम्ल पर निर्भर करती है। फैटी अम्ल दो प्रकार के होते हैं — संतृप्त और असंतृप्त। संतृप्त (सैचुरेटेड) वसीय अम्ल ठोस वसा में पाये जाते हैं और असंतृप्त वसीय अम्ल तेल में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। वनस्पति तेलों में असंतृप्त वसीय अम्ल अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।
क्या आपको पता है कि वसा और तेल में क्या अन्तर होता है?
जब कोई पदार्थ कमरे के सामान्य तापमान पर तरल होता है तो “तेल” कहलाता है और कमरे के तापक्रम पर “ठोस” होता है तो वसा कहलाता है।
कार्य
- (i) ऊर्जा का केन्द्रित स्रोत है।
- (ii) प्रोटीन का ऊर्जा के रूप में होने वाले प्रयोग को कम करता है।
स्रोत
- • वनस्पति तेल, घी, मक्खन
- • तिलहन और मूँगफली
- • मांस, मुर्गी, मछली, अण्डे
- • दूध, पनीर, चीज़
विशेषताएँ
- (i) वसा से भोजन में स्वाद, पाचनशीलता व सुन्दरता बढ़ती है।
- (ii) वसा से पेट भरे रहने की अनुभूति होती है। यह ज़्यादा देर तक पेट में ठहरता है।
- (iii) वसा में घुलनशील विटामिन ए, डी, ई, के को संपूर्ण शरीर में पहुँचाता है और इनके अवशोषण में मदद करता है।
- (iv) शरीर का तापमान बनाये रखता है। त्वचा के नीचे वसा शरीर की गर्मी को बनाये रखने में मदद करता है।
- (v) कोमल व महत्त्वपूर्ण शारीरिक अंगों को संरक्षण देता है।
- (vi) तन्तुओं के विकास में सहायक होता है।
(2.1.) सूक्ष्म पोषक तत्त्व
ऐसे अन्य महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्व जो भोजन में अल्प मात्रा में रहते हैं पर शरीर के लिये आवश्यक हैं, सूक्ष्म पोषक तत्त्व कहलाते हैं। “खनिज” और “विटामिन” सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की श्रेणी में आते हैं। यदि ये सूक्ष्म पोषक तत्त्व उचित मात्रा में नहीं खाये जायें, तो कुछ रोग होने की संभावना हो जाती है।
खनिज तथा विटामिन सूक्ष्म पोषक तत्त्व कहलाते हैं।
आइये अब कुछ महत्त्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक तत्त्वों का अध्ययन करें।
(a) विटामिन
हमारे शरीर में विटामिन अति अल्प मात्रा में रहते हैं पर आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि शरीर के सभी मुख्य कार्यों में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। ये विटामिन दो प्रकार के होते हैं :–
(i) वसा में घुलनशील
ए, डी, ई और के
(ii) पानी में घुलनशील
बी और सी, आइये अब इन विटामिनों के कार्यों तथा स्रोतों के बारे में जानकारी प्राप्त करें।
(b) खनिज लवण (मिनरल्स)
संपूर्ण शारीरिक तन्तुओं में खनिज बहुत ही अल्प मात्रा में होते हैं, परन्तु ये शरीर को बनाये रखने और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शारीरिक प्रक्रियाओं के लिये अति आवश्यक हैं। कुल 19 खनिज लवण ऐसे हैं जो विभिन्न शारीरिक क्रियाओं के लिये विभिन्न मात्राओं में आवश्यक होते हैं।
आइये अब कुछ खनिजों के विषय में जानकारी प्राप्त करें।
कैल्शियम
कैल्शियम और फॉस्फोरस हमें दूध, दही, हरी पत्तेदार सब्जियों, रागी, तेल, दालें और बीजों में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो जाते हैं। अन्य भोज्य पदार्थ भी अच्छी मात्रा में कैल्शियम प्रदान करते हैं।
कैल्शियम के मुख्य कार्य
• कैल्शियम का मुख्य कार्य दाँतों तथा हड्डियों को बनाना है।
कैल्शियम की कमी से शरीर में हड्डियों की वृद्धि कम हो जाती है। इसका असर खास तौर पर बच्चों व बुज़ुर्गों पर पड़ता है। इसकी कमी से ऑस्टियोपोरोसिस नामक बीमारी हो जाती है, जिसमें हड्डी कमजोर हो जाती है तथा जल्दी टूटने की संभावना होती है।
• मांसपेशियों की गतिशीलता तथा रक्त जमाव के लिये भी कैल्शियम आवश्यक है।
हड्डी बनाने, रक्त जमाव तथा मांसपेशियों की गतिशीलता के लिये कैल्शियम अनिवार्य है।
लौह तत्त्व (आयरन)
शरीर को लौह तत्त्व बहुत ही अल्प मात्रा में चाहिए। यह हीमोग्लोबिन का एक आवश्यक भाग है। हीमोग्लोबिन रक्त की लाल कोशिकाओं में रहता है तथा रक्त का लाल रंग इसी के कारण होता है।
साबुत अनाज व दालें हमारे शरीर को लौह तत्त्व प्रदान करती हैं। हरी पत्तेदार सब्जियों, अण्डे के पीले भाग, जिगर और मांस से भी लौह तत्त्व प्राप्त होता है।
हमारे देश में जनसंख्या का एक बड़ा भाग, विशेषकर महिलाएँ एवं बच्चे, लौह तत्त्व की कमी से होने वाली बीमारी “एनीमिया” से ग्रस्त हैं।
ऐसा इसलिए नहीं है कि लोग लौह तत्त्व युक्त भोजन नहीं करते, लेकिन हमारे भोजन में ऑक्ज़ीलेट और फाइटेट होने से लौह तत्त्व का प्रयोग व संचार शरीर में कम हो पाता है। विटामिन सी और प्रोटीन लौह तत्त्व के संचार और उपयोग में सहायक होते हैं।
ऑक्ज़ीलेट और फाइटेट को “बाधक तत्त्व” कहा जाता है, जबकि प्रोटीन और विटामिन सी सहायक तत्त्व माने जाते हैं।
विटामिन सी को सहायक तत्त्व कहा जाता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बच्चों और महिलाओं को, रक्त की कमी से मुक्ति पाने के लिये, लौह गोलियाँ वितरित करते हैं।
हीमोग्लोबिन के निर्माण के लिये लौह तत्त्व अति आवश्यक है।
आयोडीन
थायराइड ग्रन्थि से उत्पन्न होने वाले थायरॉक्सिन नामक हार्मोन के लिये आयोडीन एक आवश्यक तत्त्व है। थायरॉक्सिन से शरीर के बहुत से कार्य सम्पन्न होने में मदद मिलती है।
पानी और भोजन आयोडीन के अच्छे स्रोत हैं। केवल कुछ पौधे आयोडीन से भरपूर होते हैं और हमें अच्छी मात्रा में आयोडीन देते हैं। समुद्री भोजन भी आयोडीन से भरपूर होता है।
आयोडीन की कमी से घेंघा या गण्डमाला नामक रोग हो जाता है। आयोडीन की कमी से बच्चों में मानसिक मंदता भी हो जाती है। भारतवर्ष के अनेक भागों के निवासी इस अभाव से प्रभावित पाये जाते हैं।
अभिवृद्धि और विकास के लिये आयोडीन आवश्यक है।
घेंघा से बचने के लिये हमें अपने प्रतिदिन के आहार में आयोडीन के स्रोतों का अवश्य प्रयोग करना चाहिए। साधारण नमक के स्थान पर हमें आयोडीनयुक्त नमक का प्रयोग करना चाहिए।
आयोडीनयुक्त नमक का प्रयोग प्रतिदिन अपने आहार में करना चाहिए।
कुछ भोज्य पदार्थों जैसे पत्तागोभी, फूलगोभी, मूली, गाजर, भिंडी, तिलहन में एक “गॉयट्रोजन” नामक तत्त्व निहित होता है, जो थायरॉक्सिन के बनने और उसके उपयोग में बाधक होता है। यह गॉयट्रोजन भोजन पकाते समय नष्ट हो जाते हैं, अतः ऊपर बताई गई भोज्य सामग्री खाने से पहले पका लेनी चाहिए।
(c) पानी
पानी हमारे शरीर का मुख्य पोषक तत्त्व है। शरीर का 2/3 भाग पानी होता है। भोजन के बिना गुज़ारा हो सकता है किन्तु पानी के बिना नहीं। यह हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं तथा अंगों के तन्तुओं में पाया जाता है। यह तन्तुओं और अंगों को चारों ओर से संरक्षण देकर उनकी आघातों से रक्षा करता है।
पानी की सहायता से पोषक तत्त्व पाचन, अवशोषण तथा संचार की प्रक्रिया द्वारा शरीर में पहुँचते हैं। पानी की सहायता से अनावश्यक तत्त्वों का मूत्र के रूप में निष्कासन होता है तथा पसीने के निष्कासन से शरीर का तापमान संतुलित बना रहता है।
साधारणतः हमें प्रतिदिन 6–8 गिलास पानी पीना चाहिए। पानी हमें दूध, छाछ या फलों के रस के रूप में भी मिल जाता है।
4-4 पोषक तत्त्वों की आवश्यकता
अब हम समझ चुके हैं कि अच्छे स्वास्थ्य के लिये सभी पोषक तत्त्वों की शरीर को आवश्यकता होती है। पर पोषण की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिये हमें कितना भोजन करना चाहिए? किसी भी व्यक्ति की पोषक तत्त्वों की आवश्यकता की मात्रा अलग-अलग बातों पर निर्भर करती है। आइये हम उनके बारे में समझें।
पोषक तत्त्वों की मात्रा पर निम्नलिखित बातों का प्रभाव पड़ता है :–
• आयु
• लम्बाई/भार
• लिंग
• जलवायु
• स्वास्थ्य
• व्यवसाय
• शारीरिक दशा
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आई.सी.एम.आर.) ने पर्याप्त अनुसंधान के पश्चात् विभिन्न वर्गों के लिये आवश्यक पोषक तत्त्वों की मात्रा निर्धारित की है। तालिका 4.4 निर्धारित दैनिक आवश्यक पोषक तत्त्वों की मात्रा को दर्शाती है।
आपने ध्यान दिया होगा कि हल्का कार्य करने वाले व्यक्ति को भारी कार्य करने वाले व्यक्ति की अपेक्षा कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। स्त्री और पुरुष तथा उनकी शारीरिक स्थिति, स्वस्थ अवस्था या बीमार अवस्था पर भी ऊर्जा की आवश्यक मात्रा निर्भर करती है।
गर्भावस्था और दूध पिलाने वाली माताओं, लड़के और लड़कियों तथा पुरुष एवं स्त्री (गर्भवती) के लिये आवश्यक पोषक तत्त्वों की मात्रा में अन्तर पर आपने ध्यान दिया होगा।
अगर आप ध्यान से तालिका देखें तो आप शिशुओं, स्कूल पूर्व की आयु के बच्चों, स्कूली बच्चों, किशोर और वयस्क सभी के लिये एक निर्धारित आवश्यक ऊर्जा की मात्रा देखेंगे। वयस्क लोगों में कार्य की प्रकृति के आधार पर ऊर्जा की आवश्यक मात्रा भिन्न-भिन्न हो जाती है।
गर्भावस्था और दुग्धस्राव के समय आवश्यक ऊर्जा की मात्रा अलग बताई गई है। व्यक्तिगत विभिन्नताओं तथा शारीरिक आवश्यकताओं के अनुरूप भी पोषक तत्त्वों की आवश्यक मात्रा निर्धारित की गई है।
4-5 आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य में परस्पर संबंध
इस पाठ के प्रारंभ में आपने आहार या भोजन के अर्थ एवं कार्यों के बारे में सीखा। आपने स्वास्थ्य की परिभाषा भी पहले पाठ में पढ़ी है। आइये हम पोषण के बारे में विस्तार से पढ़ें। हम समझें कि आहार तथा पोषण किस प्रकार से स्वास्थ्य से संबंधित है।
“पोषण” एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें भोजन केन्द्र बिन्दु है। पोषण की सबसे सरल परिभाषा है — मुख में प्रवेश करने के बाद भोजन पर किया गया अध्ययन।
पोषण की औपचारिक परिभाषा इस प्रकार है — ऐसी प्रक्रिया का अध्ययन जिसमें जीव अपनी वृद्धि, विकास व शरीर को बनाये रखने के लिये भोजन ग्रहण कर, उसे सही ढंग से उपयोग में लाते हैं।
सभी भोज्य पदार्थों में कुछ ऐसे आवश्यक तत्त्व होते हैं जो हमारे शरीर में कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। भोजन में उपस्थित ये आवश्यक तत्त्व ही “पोषक तत्त्व” कहलाते हैं।
ये पोषक तत्त्व शरीर के विभिन्न कार्यों में सहायक होते हैं जैसे कि वृद्धि में, अंगों के संरक्षण में, रोग के प्रति संरक्षण में।
किसी भी व्यक्ति का स्वास्थ्य, उसके द्वारा प्रयुक्त भोजन के प्रकार व मात्रा पर निर्भर करता है। एक व्यक्ति की वृद्धि व विकास के लिये तथा स्वस्थ जीवन के लिये अच्छा पोषण अनिवार्य है।
जब कोई व्यक्ति सही भोजन नहीं करता तो शरीर का सामान्य विकास नहीं होता। शरीर के कुछ अवयवों में कुछ बीमारी की भी आशंका रहती है। कुपोषण से मानसिक व सामाजिक दोनों ही विकास पर प्रभाव पड़ता है।


