भारत में तेजी से बढ़ रहे फेफड़ों के कैंसर के मामले, महिलाएं और गैर-धूम्रपान करने वाले भी चपेट में
स्वास्थ्य विशेष | स्वदेशी हेल्थ रिसर्च इंस्टीट्यूट
भारत में फेफड़ों का कैंसर (लंग कैंसर) तेजी से उभरती हुई स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल हो चुका है। एक समय था जब इसे केवल धूम्रपान करने वालों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। आज बड़ी संख्या में ऐसे मरीज सामने आ रहे हैं जिन्होंने कभी सिगरेट या तंबाकू का सेवन नहीं किया, फिर भी वे लंग कैंसर से पीड़ित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ता वायु प्रदूषण, घरेलू धुआं, औद्योगिक रसायन, बदलती जीवनशैली और आनुवंशिक कारक इस बीमारी के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अधिकांश रोगियों में बीमारी का पता तब चलता है जब कैंसर तीसरे या चौथे चरण में पहुंच चुका होता है।
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भारत में क्यों बढ़ रही है समस्या?
हालिया स्वास्थ्य आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 तक देश में लंग कैंसर के मरीजों की संख्या लगभग 81 हजार तक पहुंचने का अनुमान है। हर वर्ष हजारों लोगों की मृत्यु इस बीमारी के कारण हो रही है। विशेषज्ञ बताते हैं कि फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौतों का बड़ा कारण इसका देर से निदान है। ऑन्कोलॉजिस्टों के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत मरीजों में कैंसर का पता उन्नत अवस्था (Advanced Stage) में चलता है। उस समय तक कैंसर फेफड़ों से बाहर शरीर के अन्य अंगों तक फैल चुका होता है, जिससे उपचार जटिल और सीमित हो जाता है।
धूम्रपान से आगे बढ़ चुका है खतरा
लंबे समय तक धूम्रपान को लंग कैंसर का सबसे बड़ा कारण माना जाता रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि तंबाकू आज भी इस बीमारी का प्रमुख जोखिम कारक है, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि आज हर चार नए मरीजों में से एक ऐसा होता है जिसने कभी धूम्रपान नहीं किया। यह बदलाव इस ओर संकेत करता है कि अन्य पर्यावरणीय और जैविक कारण भी तेजी से प्रभाव डाल रहे हैं।
वायु प्रदूषण: एक अदृश्य हत्यारा
भारत के कई बड़े शहर लगातार खराब वायु गुणवत्ता की समस्या से जूझ रहे हैं। वाहनों, उद्योगों, निर्माण कार्यों और जीवाश्म ईंधनों से निकलने वाले सूक्ष्म कण (PM2.5 और PM10) सीधे फेफड़ों तक पहुंचते हैं। ये सूक्ष्म कण फेफड़ों में सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और कोशिकीय क्षति उत्पन्न करते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से फेफड़ों की कोशिकाओं के डीएनए में परिवर्तन होने लगते हैं, जो आगे चलकर कैंसर का रूप ले सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली, कोलकाता और अन्य महानगरों में बढ़ता प्रदूषण भविष्य में लंग कैंसर के मामलों को और बढ़ा सकता है।
महिलाओं में क्यों बढ़ रहा है लंग कैंसर?
हाल के वर्षों में महिला रोगियों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। इसके पीछे घरेलू वायु प्रदूषण को प्रमुख कारण माना जा रहा है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में आज भी लाखों परिवार खाना पकाने के लिए लकड़ी, कोयला और अन्य बायोमास ईंधनों का उपयोग करते हैं। इनके धुएं में मौजूद विषैले कण लंबे समय तक सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते रहते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि जिन घरों में रसोई का वेंटिलेशन पर्याप्त नहीं होता, वहां महिलाओं में फेफड़ों की बीमारियों और कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
इसके अलावा महिलाओं में हार्मोनल प्रभाव, आनुवंशिक परिवर्तन और निष्क्रिय धूम्रपान (Passive Smoking) भी जोखिम बढ़ाने वाले कारक माने जाते हैं।
औद्योगिक क्षेत्रों में रहने वालों को विशेष सावधानी
औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले धुएं और रासायनिक प्रदूषकों में कई प्रकार के कैंसरजनक तत्व (Carcinogens) पाए जाते हैं। एस्बेस्टस, सिलिका, आर्सेनिक और विभिन्न औद्योगिक रसायनों के लंबे समय तक संपर्क से फेफड़ों की कोशिकाओं में स्थायी क्षति हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे क्षेत्रों में रहने या काम करने वाले लोगों को नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए।
किन लक्षणों को न करें नजरअंदाज?
लंग कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य श्वसन रोगों जैसे लगते हैं, इसलिए लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते।
यदि निम्नलिखित लक्षण लगातार बने रहें, तो तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए:
- लगातार खांसी रहना
- खांसी में खून आना
- सीने में दर्द
- सांस फूलना
- आवाज बैठना
- बार-बार फेफड़ों का संक्रमण
- भूख कम लगना
- तेजी से वजन घटना
- अत्यधिक थकान
समय पर जांच क्यों जरूरी है?
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि फेफड़ों के कैंसर की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए, तो उपचार की सफलता कई गुना बढ़ जाती है।
उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों, विशेष रूप से लंबे समय तक धूम्रपान करने वालों को नियमित अंतराल पर लो-डोज सीटी स्कैन जैसी जांचें कराने पर विचार करना चाहिए। आधुनिक चिकित्सा तकनीकों ने अब कैंसर की प्रारंभिक पहचान को पहले की तुलना में अधिक प्रभावी बना दिया है।
क्या लंग कैंसर से बचाव संभव है?
पूरी तरह बचाव हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों की सलाह
- ✔ धूम्रपान और तंबाकू का सेवन पूरी तरह छोड़ें।
- ✔ घर और रसोई में पर्याप्त वेंटिलेशन रखें।
- ✔ प्रदूषण अधिक होने पर मास्क का उपयोग करें।
- ✔ नियमित व्यायाम करें।
- ✔ फल, सब्जियां और एंटीऑक्सिडेंट युक्त आहार लें।
- ✔ स्वास्थ्य जांच को नियमित आदत बनाएं।
- ✔ लगातार खांसी या सांस संबंधी लक्षणों को नजरअंदाज न करें।
निष्कर्ष
लंग कैंसर अब केवल धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं रह गया है। बढ़ता वायु प्रदूषण, घरेलू धुआं, औद्योगिक प्रदूषण और बदलती जीवनशैली इस रोग को नई दिशा दे रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अधिकांश मामलों का पता देर से चलता है। इसलिए जागरूकता, समय पर जांच और स्वस्थ जीवनशैली ही इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी मार्ग है।
याद रखें— लगातार खांसी, सांस फूलना या खांसी में खून आना जैसे संकेतों को कभी नजरअंदाज न करें। समय पर पहचान जीवन बचा सकती है।
