धूम्रपान न करने वाले व्यक्तियों में फेफड़ों का कैंसर: जोखिम कारकों, आणविक तंत्रों एवं निवारण रणनीतियों की समीक्षा

Swadeshi Health
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फेफड़ों का कैंसर (Lung Cancer) विश्व स्तर पर कैंसर से होने वाली मृत्यु का प्रमुख कारण है। यद्यपि तंबाकू सेवन को इसका सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारक माना जाता है, किंतु हाल के दशकों में धूम्रपान न करने वाले व्यक्तियों (Never-Smokers) में फेफड़ों के कैंसर की बढ़ती घटनाओं ने शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया है। वैश्विक स्तर पर फेफड़ों के कैंसर के लगभग 15–25% मामले ऐसे व्यक्तियों में पाए जाते हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। यह समीक्षा लेख गैर-धूम्रपान करने वालों में फेफड़ों के कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों, रोगजनन (Pathogenesis), आणविक उत्परिवर्तनों (Molecular Mutations) तथा निवारण उपायों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

मुख्य शब्द (Keywords): फेफड़ों का कैंसर, गैर-धूम्रपानकर्ता, EGFR, वायु प्रदूषण, रेडॉन, कार्सिनोजेनेसिस, आणविक ऑन्कोलॉजी

1. परिचय (Introduction)

फेफड़ों का कैंसर विश्व स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। ग्लोबोकैन (GLOBOCAN) के आंकड़ों के अनुसार यह विश्व में कैंसर से मृत्यु का प्रमुख कारण है। परंपरागत रूप से इस रोग का संबंध धूम्रपान से जोड़ा जाता रहा है, किंतु महामारी विज्ञान संबंधी अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि बड़ी संख्या में रोगी ऐसे हैं जिनमें कैंसर का विकास बिना प्रत्यक्ष तंबाकू सेवन के होता है।

गैर-धूम्रपान करने वालों में विकसित होने वाला फेफड़ों का कैंसर जैविक, आनुवंशिक एवं आणविक स्तर पर धूम्रपान-जनित कैंसर से भिन्न विशेषताएं प्रदर्शित करता है। इस कारण आधुनिक ऑन्कोलॉजी में इसे एक पृथक रोग-इकाई (Distinct Clinical Entity) के रूप में देखा जा रहा है।

2. रोगजनन (Pathogenesis)

फेफड़ों का कैंसर बहु-कारकीय (Multifactorial) रोग है, जिसमें पर्यावरणीय एवं आनुवंशिक कारक मिलकर कोशिकीय डीएनए को क्षति पहुंचाते हैं। यह प्रक्रिया डीएनए क्षति, ऑन्कोजीन सक्रियण, ट्यूमर-दमनकारी जीनों की निष्क्रियता, अनियंत्रित कोशिका विभाजन, ट्यूमर निर्माण तथा मेटास्टेसिस जैसे चरणों से होकर गुजरती है। ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, दीर्घकालिक सूजन (Chronic Inflammation) तथा एपिजेनेटिक परिवर्तन इस प्रक्रिया को और अधिक जटिल बनाते हैं।

3. प्रमुख जोखिम कारक (Major Risk Factors)

3.1 रेडॉन गैस (Radon Exposure)

रेडॉन एक प्राकृतिक रेडियोधर्मी गैस है जो यूरेनियम के विघटन से उत्पन्न होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह धूम्रपान के बाद फेफड़ों के कैंसर का दूसरा प्रमुख कारण है। रेडॉन से उत्पन्न अल्फा कण फेफड़ों की कोशिकाओं में डीएनए क्षति, गुणसूत्रीय अस्थिरता तथा कैंसरजनक उत्परिवर्तनों को बढ़ावा देते हैं।

3.2 वायु प्रदूषण (Air Pollution)

PM2.5 तथा PM10 कण फेफड़ों के कैंसर के प्रमुख पर्यावरणीय जोखिम कारकों में शामिल हैं। इनमें उपस्थित भारी धातुएं तथा कार्सिनोजेनिक रसायन ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, डीएनए क्षति तथा दीर्घकालिक सूजन उत्पन्न करते हैं, जो कैंसर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

3.3 सेकेंडहैंड स्मोक (Secondhand Smoke)

परोक्ष धूम्रपान में हजारों रासायनिक यौगिक मौजूद होते हैं, जिनमें अनेक ज्ञात कार्सिनोजन हैं। इनके लगातार संपर्क से फेफड़ों की उपकला कोशिकाओं में संरचनात्मक एवं आनुवंशिक परिवर्तन विकसित हो सकते हैं।

3.4 घरेलू वायु प्रदूषण (Indoor Air Pollution)

लकड़ी, कोयला तथा अन्य बायोमास ईंधनों के दहन से उत्पन्न धुआं फेफड़ों के कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है। विकासशील देशों में यह विशेष रूप से महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है।

3.5 व्यावसायिक संपर्क (Occupational Exposure)

एस्बेस्टस, सिलिका, क्रोमियम, निकेल, डीजल एग्जॉस्ट तथा आर्सेनिक जैसे पदार्थों के दीर्घकालिक संपर्क को फेफड़ों के कैंसर से जोड़ा गया है। औद्योगिक एवं खनन क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों में यह जोखिम अधिक पाया जाता है।

4. आणविक एवं आनुवंशिक कारक (Molecular and Genetic Factors)

गैर-धूम्रपान करने वालों में फेफड़ों का कैंसर विशिष्ट आणविक प्रोफाइल प्रदर्शित करता है। EGFR उत्परिवर्तन विशेष रूप से एशियाई आबादी में अधिक देखा जाता है। इसके अतिरिक्त ALK Rearrangement, ROS1 Alterations तथा KRAS Mutations भी रोग की उत्पत्ति और प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

5. नैदानिक विशेषताएं (Clinical Features)

रोग के प्रारंभिक चरणों में लक्षण स्पष्ट नहीं होते। प्रमुख लक्षणों में लगातार खांसी, रक्तयुक्त कफ, सांस फूलना, सीने में दर्द, वजन घटना तथा अत्यधिक थकान शामिल हैं। देर से निदान रोग की मृत्यु-दर बढ़ाने वाला प्रमुख कारक है।

6. निदान एवं स्क्रीनिंग (Diagnosis and Screening)

फेफड़ों के कैंसर के निदान के लिए लो-डोज सीटी स्कैन (LDCT), ब्रोंकोस्कोपी, हिस्टोपैथोलॉजिकल परीक्षण, मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग तथा नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग (NGS) का उपयोग किया जाता है। उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों में नियमित स्क्रीनिंग से प्रारंभिक पहचान संभव हो सकती है।

7. उपचार (Treatment)

आधुनिक उपचार पद्धतियों में शल्य चिकित्सा, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी तथा टार्गेटेड थेरेपी शामिल हैं। EGFR-TKI, ALK Inhibitors तथा ROS1 Inhibitors जैसे लक्षित उपचारों ने रोगियों के परिणामों में उल्लेखनीय सुधार किया है।

8. निवारण (Prevention)

फेफड़ों के कैंसर की रोकथाम के लिए वायु प्रदूषण नियंत्रण, रेडॉन मॉनिटरिंग, धूम्रपान-मुक्त वातावरण, स्वच्छ ईंधन का उपयोग, व्यावसायिक सुरक्षा उपाय तथा नियमित स्वास्थ्य जांच आवश्यक मानी जाती हैं।

9. निष्कर्ष (Conclusion)

गैर-धूम्रपान करने वालों में फेफड़ों का कैंसर एक उभरती हुई वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य दर्शाते हैं कि रेडॉन, वायु प्रदूषण, घरेलू धुआं, व्यावसायिक संपर्क तथा आनुवंशिक उत्परिवर्तन इसके प्रमुख जोखिम कारक हैं। रोग की जटिल आणविक प्रकृति को समझना व्यक्तिगत उपचार (Precision Medicine) तथा प्रभावी निवारण रणनीतियों के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। भविष्य के अनुसंधान पर्यावरणीय जोखिम कारकों और आणविक तंत्रों के बीच संबंधों को और स्पष्ट कर सकते हैं, जिससे रोग की रोकथाम और उपचार दोनों में सुधार संभव होगा।

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